24 मई 2010

मन घोड़ो बिना लगाम रो


कुण जाणे किण टेम बदल्ज्या,
कोड़ी एक छदाम रो ,
मन घोड़ो बिना लगाम रो,

काया ने घर में पटक झटक, घूमै मौजी असमाना में ,
कुबदी लाखों उत्पात करे, सूतै रे धरज्या कानां में,
महं ढूंढूं बाग़ बगीचा में, ओ छाने राख़ मसाणां में,
हैरान करे काया कल्पे, लाधै नी पलक ठिकाणा में ,
दोड़े हङबङ दङबङ करतो,
है भूखो ख़ाली नाम रो,
मन घोड़ो बिना लगाम रो,

1 टिप्पणी:

  1. Ramgopalji aap apni kavitaye likhe. Aap lekhak ke roop me rajasthani sahity me yogdan kare n ki prastutakarta ke rup me. Rajasthani sahity aapse kuch srjan ki aasha rakhata hai.aap use kuch naya de.

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