01 जून 2010

जगत सुपणे री माया है,

जीवण जग जंजाळ,
जगत सुपणे री माया है,
बीत गए दिन ढळते-
दिन री ढळती छाया है,
हाट - हाट पर ठग सौदागर,लाग्या ठीक ठगाई में,
गहळ नसै में घना ठगीज्या, जीवण बिणज कमाई में,
करम कमाई घाटो लाग्यौ,
मूळ गमाया है,
बीत गए दिन ढळते-
दिन री ढळती छाया है,
हरख्या निरख्या नेड़ा सिरक्या, हिवङै री अळियां- गळियां,
चख चख कर टोळी सूं टळग्या,लोग बतावे आंगळियां,
प्रीत तणी पत गई जगत रा,
लोग हंसाया है,
बीत गए दिन ढळते-
दिन री ढळती छाया है,
बदळ गई पतवारयां, सागण खेत, बदळ गिया हाळी,
बाग़-बगिचां, ठोड ठिकाणे रुंख, बदळ गिया माळी,
टोळी रा पंछिङा टळग्या,
चित भरमाया है,
बीत गए दिन ढळते-
दिन री ढळती छाया है,
गळो भरीजे नाम लेवतां। सुर बिन गीत कियां गाऊं,
बळती सांसां नैण उबळग्या, मर मर जगत जियां जाऊं,
पलकां री गागर में सागर,
जळ भर आया है,
बीत गए दिन ढळते-
दिन री ढळती छाया है,

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर रचना है पढ़कर बहुत अच्छा लगा

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  2. तारीफ के लिए हर शब्द छोटा है - बेमिशाल प्रस्तुति - आभार.

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